

सीमा परिहार
भारत के बीहड़ सिर्फ भूगोल नहीं रहे — वे कहानियों, संघर्षों और टूटे हुए सपनों की जमीन भी रहे हैं। सीमा परिहार की कहानी इसी मिट्टी से जन्म लेती है — एक ऐसी लड़की की कथा, जिसे हालात ने अपराध की दुनिया में धकेला, लेकिन जिसने अंततः अपनी दिशा खुद चुनी।
बचपन: एक अचानक बदली दुनिया
सीमा का बचपन सामान्य था — सपनों और मासूमियत से भरा। लेकिन किशोरावस्था में एक अपहरण ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। उस घटना ने उन्हें ऐसे माहौल में पहुँचा दिया जहाँ भय, हिंसा और जीवित रहने की जद्दोजहद रोज़मर्रा की हकीकत थी।
यह सिर्फ एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं थी — यह उस सामाजिक ढाँचे की झलक थी जहाँ कमजोर अक्सर व्यवस्था की दरारों में गिर जाते हैं।
बीहड़ों की ज़िंदगी: डर और पहचान
समय के साथ सीमा बीहड़ों का हिस्सा बन गईं। उनके नाम से डर भी जुड़ा और जिज्ञासा भी। मीडिया ने उन्हें “डाकू” कहा, लेकिन उनके जीवन की कहानी सिर्फ अपराध की नहीं — बल्कि परिस्थितियों से बने फैसलों की थी।
बीहड़ों में उनका अस्तित्व शक्ति और असुरक्षा के बीच झूलता रहा। हर दिन जीना, भरोसा करना, और बचना — यही उनका सच
था।
मोड़: आत्मसमर्पण और नई राह

‘सीमा परिहार’
लंबे समय बाद सीमा ने आत्मसमर्पण किया। यह सिर्फ कानून के सामने झुकना नहीं था — बल्कि एक नई शुरुआत का फैसला था। जेल की सलाखों के पीछे उन्होंने पहली बार स्थिर जीवन की संभावना देखी।
रिहाई के बाद उन्होंने समाज में लौटने की कोशिश की — राजनीति और सामाजिक कामों के जरिए। उनका लक्ष्य था — उस दुनिया को समझना और बदलना जिसने कभी उन्हें हाशिए पर धकेल दिया था।
विरासत: सवाल और सीख
सीमा परिहार की कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है — क्या हर अपराधी जन्म से अपराधी होता है? या समाज और परिस्थितियाँ कई बार इंसानों को ऐसे रास्तों पर ले जाती हैं जहाँ विकल्प सीमित हो जाते हैं?
उनकी यात्रा हमें बताती है कि बदलाव संभव है — चाहे अतीत कितना ही भारी क्यों न हो।
समापन
बीहड़ों से निकलकर समाज की मुख्यधारा तक पहुँचना सिर्फ भौगोलिक यात्रा नहीं — यह पहचान, साहस और पुनर्जन्म की कहानी है।
सीमा परिहार की दास्तान हमें याद दिलाती है: इंसान अपनी कहानी का आखिरी अध्याय खुद लिख सकता है।
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