बात 1965 की है…
हमारा गाँव छोटा सा था, और उस समय बिजली का नाम-निशान नहीं था। रात होते ही पूरा इलाका अंधेरे में डूब जाता था। लोग जल्दी खाना खाकर सो जाते थे, क्योंकि रात में बाहर निकलना कोई पसंद नहीं करता था।
मैं उस समय करीब 13 साल का था। मेरा नाम रमेश है… और जो मैं आपको बताने जा रहा हूँ, वो मेरे साथ सच में हुआ था।
मुझे बचपन से ही रात में पढ़ने की आदत थी। दिन में खेतों में पिता के साथ काम करना पड़ता था, इसलिए पढ़ाई का समय सिर्फ रात को ही मिलता था।
घर में एक छोटा सा दीया था, लेकिन उसकी रोशनी बहुत कम होती थी। इसलिए मैं अक्सर घर के पीछे वाले आँगन में बैठकर पढ़ता था, जहाँ आसमान साफ दिखता था।
मुझे लगता था कि चाँद और तारों की रोशनी में पढ़ना आसान होता है…
लेकिन धीरे-धीरे मुझे एहसास हुआ—मैं गलत था।
एक रात…
मैं हमेशा की तरह अपनी किताब लेकर आँगन में बैठा था। हवा बिल्कुल शांत थी।
तभी मुझे लगा जैसे कोई मेरे पीछे खड़ा है।
मैंने सोचा शायद माँ होगी…
“माँ… पानी चाहिए क्या?”
मैंने बिना पीछे देखे पूछा।
कोई जवाब नहीं आया।
मैंने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा…
वहाँ कोई नहीं था।
“शायद मेरा वहम है…”
मैंने खुद से कहा और फिर पढ़ने लगा।
लेकिन कुछ मिनट बाद…
फिर वही एहसास।
इस बार ज़्यादा साफ।
जैसे कोई मेरी किताब के ऊपर झुककर पढ़ रहा हो।
मेरे हाथ काँपने लगे।
मैंने हिम्मत करके फिर से पीछे देखा—
इस बार…
मुझे कोई दिखा।
एक बूढ़ा आदमी…
सफेद धोती, झुका हुआ शरीर… और उसकी आँखें…
अजीब तरह से चमक रही थीं।
मैं डर गया, लेकिन उसने धीरे से कहा—
“डर मत… मैं तुझे पढ़ाने आया हूँ…”
उसकी आवाज बहुत धीमी थी… लेकिन साफ सुनाई दे रही थी।
मैंने घबराते हुए पूछा—
“आप… कौन हो?”
वो हल्का सा मुस्कुराया—
“तू बस पढ़… सवाल मत पूछ…”
पता नहीं क्यों…
उसकी बात सुनकर मैं शांत हो गया।
और फिर…
वो मुझे पढ़ाने लगा।
अजीब बात ये थी कि जो चीज़ें मुझे समझ नहीं आती थीं… वो उसके समझाने से एकदम साफ हो जाती थीं।
गणित के मुश्किल सवाल… इतिहास की तारीखें… सब कुछ।
अब ये रोज़ का सिलसिला बन गया।
हर रात… ठीक आधी रात को…
वो बूढ़ा आदमी आता… और मुझे पढ़ाता।
मैंने ये बात घर वालों को बताने की कोशिश की…
लेकिन किसी ने यकीन नहीं किया।
सबको लगा मैं कहानी बना रहा हूँ।
एक दिन मेरे पिता ने गुस्से में कहा—
“आज रात मैं देखूंगा कौन आता है…”
उस रात…
मैं हमेशा की तरह आँगन में बैठा था।
पिता अंदर खिड़की के पीछे छुपे हुए थे।
घड़ी ने जैसे ही बारह बजाए…
हवा अचानक ठंडी हो गई।
दीये की लौ कांपने लगी।
और फिर…
वो आ गया।
मैंने धीरे से कहा—
“आप आ गए…”
वो मेरे सामने खड़ा था।
लेकिन इस बार…
उसका चेहरा पहले से अलग था।
ज्यादा… डरावना।
तभी…
पिता अचानक बाहर आ गए।
“कौन है तू?!”
उन्होंने जोर से चिल्लाया।
जैसे ही उनकी नजर उस बूढ़े आदमी पर पड़ी—
उनका चेहरा सफेद पड़ गया।
“ये… ये तो…”
वो कुछ बोल ही नहीं पाए।
और अचानक जमीन पर गिर पड़े।
मैं घबरा गया—
“बाबा! क्या हुआ?”
तभी…
वो बूढ़ा आदमी धीरे-धीरे मेरी तरफ मुड़ा।
उसकी आँखें अब पूरी तरह काली हो चुकी थीं।
“तूने गलती कर दी…”
उसने भारी आवाज में कहा।
“अब ये भी जान गया है…”
मैं कुछ समझ पाता, उससे पहले…
वो धीरे-धीरे हवा में गायब हो गया।
अगले दिन…
पिता ने मुझसे बात करना बंद कर दिया।
वो बस एक ही बात बार-बार कहते—
“वो इंसान नहीं है…”
कुछ दिन बाद…
पिता अचानक बीमार पड़ गए।
और एक हफ्ते के अंदर… उनकी मौत हो गई।
मरने से पहले उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और कहा—
“रमेश… उससे दूर रहना…”
“वो तुझे पढ़ा नहीं रहा… वो तुझे अपने जैसा बना रहा है…”
मैं डर गया…
उस रात मैं बाहर नहीं गया।
लेकिन…
आधी रात को…
दरवाजे पर दस्तक हुई।
ठक… ठक… ठक…
मैंने डरते हुए पूछा—
“कौन है…?”
बाहर से वही आवाज आई—
“मैं हूँ… आज पढ़ाई नहीं करेगा?”
मैं कांप गया।
“नहीं… मुझे नहीं पढ़ना…”
कुछ सेकंड के लिए खामोशी छा गई।
फिर…
धीरे से आवाज आई—
“ठीक है…”
मुझे लगा वो चला गया।
लेकिन तभी…
मेरे पीछे से आवाज आई—
“तो मैं अंदर आ जाता हूँ…”
मैंने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा…
वो मेरे कमरे के अंदर खड़ा था।
उसकी मुस्कान अब डरावनी हो चुकी थी।
“अब तू कहीं नहीं जा सकता…”
उस रात के बाद…
मुझे कुछ याद नहीं।
जब मेरी आँख खुली…
मैं उसी आँगन में बैठा था…
मेरे सामने एक छोटा बच्चा बैठा था…
किताब लेकर।
और मैं…
उसे पढ़ा रहा था।
आज… इतने साल बाद…
मैं समझ चुका हूँ—
वो बूढ़ा आदमी कौन था।
वो कोई और नहीं…
मेरा ही भविष्य था।
और अब…
मैं हर रात किसी नए बच्चे का इंतज़ार करता हूँ…
जो अंधेरे में पढ़ने आए…
क्योंकि…
ये सिलसिला कभी खत्म नहीं होता।
