बात उन दिनों की है जब घरों में बिजली नहीं होती थी…
1960 का दशक था। गाँव छोटा था, चारों तरफ खेत, कच्चे घर और रात होते ही घुप अंधेरा। लोग सूरज ढलते ही अपने-अपने घरों में सिमट जाते थे।
उसी गाँव में एक 12 साल का बच्चा रहता था—मोहन।
मोहन बाकी बच्चों से थोड़ा अलग था। जहाँ उसके दोस्त शाम होते ही खेल-कूद कर सो जाते, वहीं मोहन रात को पढ़ाई करता था।
लेकिन एक अजीब बात थी…
वो कभी दीये की रोशनी में नहीं पढ़ता था।
वो हमेशा चाँद की रोशनी में पढ़ता था।
मोहन के घर वाले भी इस बात से परेशान रहते थे।
उसकी माँ कई बार कह चुकी थी—
“बेटा, अंदर आ जाओ… दीया जला देती हूँ।”
लेकिन मोहन हर बार एक ही बात कहता—
“नहीं माँ… चाँद की रोशनी में साफ दिखता है…”
पहले तो सबको लगा कि ये बच्चे की जिद है…
लेकिन धीरे-धीरे गाँव वालों को कुछ अजीब लगने लगा।
एक दिन उसके पिता ने गौर किया…
उस रात अमावस्या थी।
आसमान में चाँद था ही नहीं।
फिर भी मोहन आँगन में बैठा पढ़ रहा था…
और उसकी किताब पर हल्की-सी रोशनी पड़ रही थी।
उसके पिता का दिल धड़क उठा।
“ये रोशनी कहाँ से आ रही है…?”
उन्होंने पास जाकर देखा…
लेकिन जैसे ही वो करीब पहुँचे—
रोशनी गायब हो गई।
और मोहन ने सिर उठाकर उन्हें देखा…
उसकी आँखें कुछ पल के लिए चमक उठीं।
उस रात के बाद से घर का माहौल बदल गया।
माँ ने उसे रात में बाहर बैठने से मना कर दिया।
लेकिन मोहन नहीं माना।
वो हर रात चुपके से उठता… और आँगन में जाकर बैठ जाता।
धीरे-धीरे गाँव में बातें फैलने लगीं—
“वो लड़का ठीक नहीं है…”
“उस पर कुछ साया है…”
एक बूढ़ी औरत ने तो साफ कह दिया—
“वो चाँद की रोशनी नहीं है… कोई और चीज़ है…”
एक रात मोहन की माँ ने उसे चुपके से देखने का फैसला किया।
वो दरवाजे के पीछे छुपकर बैठ गई।
आधी रात हुई…
मोहन धीरे से उठा… और बाहर चला गया।
माँ भी उसके पीछे-पीछे गई।
जैसे ही उसने आँगन में झाँका—
उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
मोहन अकेला नहीं था।
उसके सामने एक सफेद साया खड़ा था।
वो साया धीरे-धीरे हवा में तैर रहा था… और उसी से हल्की चाँद जैसी रोशनी निकल रही थी।
मोहन अपनी किताब खोलकर बैठा था…
और वो साया…
उसे पढ़ा रहा था।
माँ का गला सूख गया।
वो डर के मारे आवाज भी नहीं निकाल पाई।
तभी…
उस साये ने धीरे-धीरे अपना सिर घुमाया…
और सीधे माँ की तरफ देखने लगा।
उसका चेहरा साफ नहीं दिख रहा था…
बस दो काली, गहरी आँखें…
जो अंधेरे में भी चमक रही थीं।
अगले ही पल…
माँ बेहोश होकर गिर गई।
सुबह जब उसकी आँख खुली, तो मोहन उसके पास बैठा था।
“माँ, आप गिर क्यों गई थीं…?”
उसकी आवाज बिल्कुल सामान्य थी।
जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो।
माँ ने डरते हुए उससे पूछा—
“कल रात… तुम्हारे साथ कौन था?”
मोहन मुस्कुराया—
“आपने देखा उसे…?”
माँ का दिल बैठ गया।
“वो… मुझे पढ़ाता है… कहता है कि मैं बहुत आगे जाऊँगा…”
उस दिन के बाद से माँ ने उसे बाहर जाने से रोकने की बहुत कोशिश की…
लेकिन हर रात…
कुछ न कुछ ऐसा होता कि मोहन फिर बाहर पहुँच जाता।
जैसे कोई उसे बुला रहा हो।
समय बीतता गया…
मोहन पढ़ाई में बहुत तेज हो गया।
गाँव के मास्टर भी हैरान थे—
“इतना छोटा बच्चा… इतनी कठिन बातें कैसे समझ लेता है?”
लेकिन इसके साथ-साथ…
मोहन में कुछ बदलाव भी आने लगे।
वो दिन में कम बोलता…
और रात होते ही उसकी आँखों में अजीब चमक आ जाती।
एक रात…
गाँव के कुछ लोगों ने फैसला किया कि वो इस रहस्य का पता लगाएंगे।
उन्होंने छुपकर मोहन को देखने की ठानी।
आधी रात…
मोहन फिर आँगन में बैठा था।
और वो साया… फिर उसके सामने था।
लेकिन इस बार…
वो साया धीरे-धीरे बड़ा होता जा रहा था।
उसका आकार इंसान से भी बड़ा हो गया।
गाँव वालों ने ये सब देखा…
और डर के मारे भागने लगे।
लेकिन तभी…
उस साये की आवाज गूंजी—
“अब बहुत देर हो चुकी है…”
अचानक…
मोहन ने अपनी किताब बंद की…
और खड़ा हो गया।
उसने धीरे-धीरे सिर उठाया…
और उसकी आँखें पूरी तरह काली हो गईं।
“अब मेरी बारी है…”
उसने एक अजीब, भारी आवाज में कहा—
जो उसकी अपनी नहीं थी।
अगले ही पल…
वो साया गायब हो गया।
और मोहन…
ज़मीन से थोड़ा ऊपर उठ गया।
गाँव वाले चिल्लाते हुए भागे…
लेकिन पीछे से एक ठंडी हवा चली…
और सब कुछ शांत हो गया।
अगली सुबह…
मोहन का घर खाली मिला।
ना मोहन… ना उसका परिवार।
जैसे वो कभी वहाँ थे ही नहीं।
सिर्फ एक चीज़ मिली—
आँगन में पड़ी एक पुरानी किताब।
जिसके पहले पन्ने पर लिखा था—
“जो चाँद की रोशनी में पढ़ता है… वो कभी अंधेरे से बाहर नहीं आता…”
आज भी…
उस गाँव में लोग कहते हैं—
अगर कोई बच्चा रात को चाँद की रोशनी में पढ़ता दिखाई दे…
तो उसे कभी टोकना मत…
क्योंकि हो सकता है—
वो अकेला न हो।
और शायद…
कोई साया आज भी किसी और मोहन का इंतज़ार कर रहा हो…
