1990 की ठंडी सर्द रात थी…
एक सिपाही—नाम था राघव—घने जंगल के बीच अपनी ड्यूटी कर रहा था। उसका काम था सीमा के पास के इलाके में निगरानी रखना। लेकिन उस रात कुछ अलग था… हवा अजीब सी ठंडी थी, पेड़ों की छाया जमीन पर इस तरह हिल रही थी जैसे कोई ज़िंदा चीज़ हो।
राघव को अंदाज़ा भी नहीं था कि वह धीरे-धीरे अपनी टीम से दूर होता जा रहा है।
पहले उसे लगा सब ठीक है… लेकिन जब उसने पीछे मुड़कर देखा—ना कोई सिपाही, ना कोई रास्ता… बस अंधेरा।
उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
“शायद मैं रास्ता भटक गया हूँ…” उसने खुद से कहा।
तभी…
हुआऊऊऊऊ…
जंगल में गूंजती हुई एक भेड़िये की आवाज़ ने उसकी रूह तक हिला दी।
उसने जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाए, लेकिन जैसे-जैसे रात गहरी होती गई, भेड़ियों की आवाज़ें बढ़ती गईं… एक नहीं… कई आवाज़ें।
अब उसे साफ महसूस हो रहा था—वह अकेला नहीं है।
डर के मारे वह भागने लगा… काँटों से भरे रास्ते, टूटे हुए पेड़, कीचड़—कुछ भी उसे रोक नहीं पाया।
भागते-भागते उसे एक गुफा दिखाई दी।
वह बिना सोचे समझे उसके अंदर घुस गया…
गुफा के अंदर घुप अंधेरा था।
राघव ने अपनी टॉर्च निकाली—रोशनी जैसे ही आगे पड़ी, उसे दीवारों पर कुछ अजीब निशान दिखे… जैसे किसी ने नाखूनों से पत्थर को खुरचा हो।
“ये क्या है…?”
उसने धीरे से आगे कदम बढ़ाया।
तभी…
टप… टप…
पानी गिरने की आवाज़ आई।
लेकिन कुछ सेकंड बाद उसे एहसास हुआ—वो पानी नहीं था।
वो खून था।
उसकी टॉर्च की रोशनी ऊपर गई—और जो उसने देखा, उसके पैर जम गए।
छत से एक मरा हुआ जानवर उल्टा लटका हुआ था… उसका शरीर आधा खाया जा चुका था।
राघव का गला सूख गया।
“यहाँ कुछ है…”
तभी गुफा के अंदर से एक धीमी गुर्राहट सुनाई दी।
घर्रररर…
उसने धीरे-धीरे टॉर्च उस दिशा में घुमाई…
और वहाँ…
दो चमकती हुई आँखें उसे घूर रही थीं।
वह पीछे हटने लगा… लेकिन तभी उसका पैर किसी चीज़ से टकराया—
उसने नीचे देखा…
एक इंसान की खोपड़ी।
अब उसे समझ आ गया—यह सिर्फ जानवरों का अड्डा नहीं था… कुछ और भी था।
अचानक गुफा के बाहर से भेड़ियों की जोरदार आवाज़ें आने लगीं।
राघव ने राहत की सांस ली—“कम से कम वो अंदर नहीं आ सकते…”
लेकिन अगले ही पल…
गुफा के अंदर जो था, वो धीरे-धीरे रोशनी में आने लगा।
वह एक भेड़िया था… लेकिन कुछ अलग।
उसका आकार सामान्य से दुगना था… आँखें लाल… और सबसे डरावनी बात—
उसके चेहरे पर इंसान जैसी मुस्कान थी।
राघव का शरीर कांपने लगा।
“ये… ये क्या है…?”
तभी वह प्राणी धीरे-धीरे खड़ा हुआ… और दो पैरों पर चलने लगा।
अब वह पूरी तरह से सामने था—आधा इंसान… आधा भेड़िया।
एक वेयरवुल्फ।
राघव भागने के लिए मुड़ा… लेकिन गुफा के मुहाने पर जो उसने देखा, उससे उसकी आखिरी उम्मीद भी खत्म हो गई।
बाहर खड़े थे—दर्जनों भेड़िये।
उनकी आँखें भी वैसी ही लाल थीं।
जैसे… वो उसका इंतजार कर रहे हों।
“तुम… यहाँ क्यों आए हो…?”
अचानक गुफा में एक भारी, डरावनी आवाज़ गूंजी।
राघव ने डरते हुए पीछे देखा—वो वेयरवुल्फ अब उसके बिल्कुल पास था।
“मैं… मैं रास्ता भटक गया…”
उसकी आवाज कांप रही थी।
वेयरवुल्फ हंसा—एक ठंडी, डरावनी हंसी।
“कोई भी यहाँ ‘भटककर’ नहीं आता… तुम्हें बुलाया गया है…”
“किसने…?”
“जंगल ने।”
तभी राघव के दिमाग में कुछ अजीब होने लगा…
उसे याद आया—आज से पहले भी वह इस जंगल में आया था… कई बार।
लेकिन हर बार… उसे कुछ याद नहीं रहता था।
जैसे कोई उसकी याददाश्त मिटा देता हो।
वेयरवुल्फ ने उसकी आँखों में देखा—
“तुम पहले भी यहाँ आ चुके हो… और हर बार तुम बचकर निकल गए…”
“लेकिन इस बार…”
उसने अपने नुकीले दांत दिखाए—
“तुम नहीं जाओगे।”
अचानक राघव के हाथ में जलन होने लगी।
उसने देखा—उसकी त्वचा बदल रही थी… नाखून बड़े हो रहे थे… शरीर भारी हो रहा था।
“ये… ये क्या हो रहा है…?”
वेयरवुल्फ ने मुस्कुराते हुए कहा—
“तुम हमारे जैसे बन रहे हो…”
अब सब कुछ साफ हो गया।
राघव कोई आम इंसान नहीं था…
वह खुद भी एक वेयरवुल्फ था—जो हर बार इंसान बनकर अपनी असली पहचान भूल जाता था।
और यह जंगल…
उसका असली घर था।
बाहर खड़े सारे भेड़िये एक साथ चिल्लाने लगे—
हुआऊऊऊऊ…
राघव की आँखें लाल हो गईं।
उसने आखिरी बार अपनी इंसानी आवाज में कहा—
“नहीं… मैं ये नहीं बन सकता…”
लेकिन देर हो चुकी थी।
कुछ ही मिनटों में…
वह भी उन्हीं के जैसा बन चुका था।
अगली सुबह…
जंगल के किनारे कुछ सिपाहियों को राघव की वर्दी मिली।
खून से सनी हुई।
लेकिन उसका शरीर… कहीं नहीं मिला।
आज भी…
कहा जाता है कि उस जंगल में रात के समय अगर कोई भटक जाए…
तो उसे भेड़ियों की आवाज़ सुनाई देती है…
और कभी-कभी…
एक इंसान की आवाज भी—
जो मदद के लिए पुकार रही होती है।
लेकिन…
जो भी उस आवाज़ के पीछे जाता है…
वो कभी वापस नहीं आता।
और शायद… अगली बार वो आवाज़ राघव की ही हो।
