बरसात अभी-अभी रुकी थी।
सड़क पर जगह-जगह पानी जमा था और स्ट्रीट लाइट की पीली रोशनी उन गड्ढों में चमक रही थी। रवि बस स्टॉप की टूटी बेंच पर बैठा था, हाथ में एक पुरानी-सी चिट्ठी लिए।
चिट्ठी के किनारे मुड़े हुए थे, जैसे इसे कई बार खोला और बंद किया गया हो।
यह चिट्ठी उसे आज नहीं मिली थी।
यह चिट्ठी उसके पास पाँच साल से थी।
लेकिन आज वह इसे आखिरी बार पढ़ने वाला था।
उसने धीरे से चिट्ठी खोली।
लिखावट वही थी — थोड़ी टेढ़ी, थोड़ी जल्दी में लिखी हुई।
“रवि,
मुझे नहीं पता हम फिर मिलेंगे या नहीं।
लेकिन अगर कभी बहुत याद आऊँ,
तो उस सड़क पर चले जाना जहाँ हम पहली बार मिले थे।
मुझे यकीन है, यादें वहीं मिल जाएँगी।”
रवि हल्का-सा मुस्कुराया।
उसे वह दिन याद आ गया।
कॉलेज का पहला साल।
नई किताबें। नए लोग। नई जगह।
और बस स्टॉप पर खड़ी एक लड़की, जो हर आती बस को जाने देती थी।
उस दिन रवि ने पूछ ही लिया था —
‘आपको जाना कहाँ है?’
लड़की ने कहा था —
‘कहीं खास नहीं… बस घर जाने का मन नहीं कर रहा।’
वहीं से बात शुरू हुई थी।
फिर रोज़ बस स्टॉप पर मिलना, साथ चाय पीना, छोटी-छोटी बातों पर हँसना… और बिना बताए एक-दूसरे की आदत बन जाना।
लेकिन ज़िंदगी कहानियों की तरह सीधी नहीं होती।
कॉलेज खत्म हुआ।
नौकरी के लिए शहर बदल गए।
पहले रोज़ बात होती थी, फिर हफ्ते में, फिर महीने में… और फिर एक दिन सिर्फ यह चिट्ठी आई।
उसके बाद कभी बात नहीं हुई।
रवि ने चिट्ठी मोड़ी और जेब में रख ली।
बस आई, रुकी, फिर चली गई।
वह नहीं चढ़ा।
वह उठा और धीरे-धीरे उस पुरानी सड़क की ओर चल पड़ा, जहाँ वे पहली बार मिले थे।
सड़क अब बदल चुकी थी।
पुरानी चाय की दुकान की जगह अब एक बड़ा कैफ़े था।
बस स्टॉप नया बन गया था।
आस-पास की इमारतें भी बदल गई थीं।
लेकिन सड़क वही थी।
रवि सड़क के किनारे खड़ा होकर इधर-उधर देखने लगा, जैसे किसी को ढूँढ रहा हो, जबकि उसे पता था कि कोई नहीं आएगा।
फिर भी—
कुछ जगहें अजीब होती हैं।
वहाँ लोग नहीं मिलते…
पर उनकी यादें मिल जाती हैं।
रवि ने जेब से चिट्ठी निकाली, एक बार फिर देखा, और पास रखे कूड़ेदान में डाल दी।
कुछ चीज़ों को संभालकर नहीं रखा जाता।
उन्हें याद करके, मुस्कुराकर… जाने दिया जाता है।
वह मुड़ा और वापस चलने लगा।
इस बार उसे बस पकड़ने की जल्दी नहीं थी।
क्योंकि कुछ सफर बस अंदर ही पूरे होते हैं।
