धुँध के उस पार | Stories in hindi

Share with friends

साँझ उतरते-उतरते पहाड़ी कस्बे पर धुँध की एक पतली चादर बिछ गई थी। स्कूल के पीछे फैले चीड़ के जंगल से आती हवा में ठंडक घुली थी, जो खिड़कियों की दरारों से भीतर तक उतर जाती थी। रश्मि ने अपनी शॉल को कंधों पर कसकर लपेट लिया और स्टाफ-रूम की बत्ती बुझाकर बाहर निकल आई।

कॉरीडोर लगभग खाली था। छुट्टियाँ शुरू होने वाली थीं, इसलिए ज्यादातर बच्चे जा चुके थे। दूर हॉस्टल के एक कमरे से लड़कियों की धीमी हँसी अब भी सुनाई दे रही थी। रश्मि कुछ पल वहीं ठिठकी रही—फिर जैसे किसी अनजाने खिंचाव से वह उस ओर बढ़ गई।

दरवाज़ा आधा खुला था।

अंदर चार-पाँच लड़कियाँ गोल घेरा बनाकर बैठी थीं। बीच में छोटा-सा स्पीकर रखा था, जिसमें धीमी आवाज़ में कोई पुराना गीत बज रहा था।

‘मैम… आप?’ एक लड़की चौंककर खड़ी हो गई।

रश्मि हल्का-सा मुस्कुराई—
‘इतनी रात को अभी तक जाग रही हो?’

‘कल सब जा रहे हैं न… तो सोचा थोड़ा साथ बैठ लें,’ दूसरी लड़की ने धीमे से कहा।

रश्मि ने कमरे में नज़र दौड़ाई। हर चेहरा उसे जाना-पहचाना था, लेकिन उस पीली रोशनी में सब कुछ जैसे थोड़ा बदल गया था—जैसे हर किसी के भीतर कोई अपनी-सी कहानी छिपी हो।

‘ठीक है… ज़्यादा देर मत करना,’ वह मुड़ने लगी।

फिर अचानक रुक गई—
‘रिया… तुमसे बाद में मिलना है।’

रिया ने चौंककर उसकी ओर देखा, पर कुछ नहीं बोली।

रश्मि वापस मुड़ गई।

कॉरीडोर में आते ही उसे एक अजीब-सी खालीपन की अनुभूति हुई। जैसे शोर से भरे उस कमरे से बाहर आते ही सब कुछ अचानक बहुत शांत हो गया हो।

वह रेलिंग के पास जाकर खड़ी हो गई।

नीचे लॉन में धुँध और गहरी हो चुकी थी। दूर सड़क पर जाती किसी गाड़ी की हेडलाइट्स कुछ पल के लिए चमकीं और फिर गायब हो गईं।

रश्मि ने आँखें बंद कर लीं।

उसे याद आया—ऐसी ही एक शाम… जब वह खुद भी किसी हॉस्टल के कमरे में बैठी हँस रही थी। तब उसे लगता था कि दुनिया बहुत बड़ी है… और ज़िंदगी में अभी बहुत कुछ होना बाकी है।

और अब—

अब वही शामें किसी और की हो चुकी थीं।

‘मैम…’

आवाज़ सुनकर वह चौंकी।

रिया सामने खड़ी थी।

‘आपने बुलाया था?’

रश्मि कुछ पल उसे देखती रही। फिर धीरे से बोली—
‘तुम कल जा रही हो?’

‘जी।’

‘घर अच्छा लगता है?’

रिया हल्का-सा मुस्कुराई—
‘हाँ… लेकिन यहाँ से जाते हुए थोड़ा अजीब भी लगता है।’

रश्मि ने सिर हिलाया।

‘हर जगह ऐसा ही लगता है… जहाँ थोड़ा मन लग जाए।’

कुछ देर दोनों चुप रहीं।

‘रिया…’ रश्मि ने धीमे स्वर में कहा, ‘कभी-कभी… कुछ चीज़ें जल्दी समझ आने लगती हैं। लेकिन हर चीज़ को पकड़कर रखना ज़रूरी नहीं होता।’

रिया ने उसकी ओर देखा—जैसे कुछ समझने की कोशिश कर रही हो।

रश्मि ने जेब से एक छोटा-सा मुड़ा हुआ कागज़ निकाला।

‘यह तुम्हारा है न?’

रिया का चेहरा एकदम सख्त हो गया।
‘मैम… वो…’

रश्मि ने उसे रोका—
‘डरने की ज़रूरत नहीं है।’

कुछ पल बाद उसने कागज़ उसकी ओर बढ़ा दिया।

‘बस… इतना याद रखना—हर भावना की अपनी उम्र होती है। उसे जी लेना… लेकिन उसमें खो मत जाना।’

रिया ने धीरे से कागज़ ले लिया।

उसकी आँखों में हल्की नमी थी—पर इस बार डर नहीं था।

‘थैंक यू मैम…’

रश्मि ने कुछ नहीं कहा। बस हल्का-सा मुस्कुरा दी।

रिया चली गई।

कॉरीडोर फिर खाली हो गया।

रश्मि वापस रेलिंग के पास आकर खड़ी हो गई। हवा अब और ठंडी हो गई थी। धुँध धीरे-धीरे पूरे परिसर को अपने में समेट रही थी।

उसे लगा—कुछ चीज़ें कभी पूरी तरह खत्म नहीं होतीं।

वे बस बदल जाती हैं…
यादों में, आदतों में… या फिर एक शांत-सी मुस्कान में।

रश्मि ने आसमान की ओर देखा।

धुँध के उस पार कुछ भी साफ़ नहीं दिख रहा था—

फिर भी…
उसे लगा, रास्ता वहीं कहीं है।

Leave a Comment